क्या आरक्षण खत्म करने का समय आ गया है?

 क्या आरक्षण खत्म करने का समय आ गया है?

दो अलग अलग चीज है इसे एक सवाल में 2 सवाल है क्या समान नागरिक संहिता संभव है हमें से संभव बनाना होगा जब तक हमारे देश में अलग-अलग लोगों के लिए अलग-अलग कानून है तब तक लोग भी अलग-अलग होंगे अगर आप चाहते हैं कि सभी भारतीय बने तो देश में एक ही कानून होना चाहिए कोई और तरीका नहीं है फिर देश को जोड़ने का आपके लिए कानून और मेरे लिए दूसरा कानून तो हम हर हाल में अलग-अलग लोग होंगे हम खुद को एक ही देश के वासियों के रूप में कभी नहीं पहचानेंगे हम लगातार इस समस्या का सामना करते आए हैं लेकिन हमारे अंदर जाने की हिम्मत नहीं है। इसे सुलझाने का समय आ गया है आरक्षण एक अलग मुद्दा है मुझे पता है युवा छात्रों को काफी नाराजगी है मुझे सीट नहीं मिली कम अंकों वाले किसी को सीट मिल गई यह सभी चीजें लेकिन हमें समझना चाहिए कि हमने इस देश में हजारों सालों से बहुत से लोगों के साथ इंसानों जैसा व्यवहार नहीं किया है |


आज भी अगर आप गांव में जाएं तो वह एक ही कोई से पानी नहीं भर सकते वह रेस्टोरेन में एक ही कब से चाय नहीं पी सकते उनके कप अलग होते हैं वह कुछ गलियों में जा नहीं सकते। वह मंदिर के सामने चल नहीं सकते उनके मुर्दा शरीर गांव से गुजर नहीं सकते अगर आप लोगों के साथ ऐसा व्यवहार करें और उन्हें कुछ विशेष अधिकार देकरअपने बराबर ना लाए तो यह अन्याय होगा लेकिन साथ ही प्रवेश के सर पर आरक्षण होना चाहिए तरक्की के स्तर पर बिल्कुल नहीं नौकरी और शिक्षा दोनों में आप उन्हें प्रवेश दीजिए लेकिन जरूरी योग्यता के बिना तरक्की मत दीजिए ऐसा होना जरूरी है वरना हम आरक्षण की वजह से काबिलियत को देंगे आरक्षण इस देश में एक दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति क्योंकि हमने हजारों सालों से भेदभाव किया है |


आरक्षण ने इस भेदभाव को मिटाने का प्रयास है क्या हमने पिछले 70 सालों में इस में सफलता पाई है बहुत से लोग उस पिंजरे से बाहर आ गए जाति का पिंजरा लेकिन आज भी एक बड़ी आबादी उसी में फंसी हुई तो समय बीतने के साथ हमें आरक्षण को दोबारा से व्यवस्थित करना ही चाहिए अलग-अलग स्थानों पर यह अलग-अलग हो सकता है तमिलनाडु की स्थिति बिहार की स्थिति गुजरात की स्थिति स्थितियां अलग अलग है हमें इसे कम से कम हर 5 साल में दोबारा व्यवस्थित करने की हिम्मत होनी चाहिए हमें आरक्षण को आंकड़ों के आधार पर व्यवस्थित करना चाहिए यानी कितनी आबादी गरीबी से निकलकर खुशहाली के ठीक-ठाक स्तर तक पहुंच गई और भेदभाव किस हद तक कम हो चुका है इस आधार पर आरक्षण को व्यवस्थित करना चाहिए लेकिन राजनीति से कोई भी राजनेता नहीं चाहता क्योंकि चुनावों का खेल है यह भी बिल्कुल किसी परीक्षा में जाने की तरह है।


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